ओबरा (सोनभद्र)।उत्तर प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी नगर पंचायत होने का गौरव रखने वाले ओबरा में सरकारी धन की खुली फिजूलखर्ची और स्थानीय प्रशासन की घोर संवेदनहीनता का एक बड़ा मामला उजागर हुआ है। ओबरा के सबसे व्यस्ततम और प्रमुख व्यावसायिक केंद्र शारदा मंदिर चौराहे (वार्ड नंबर 3) पर राहगीरों, स्थानीय दुकानदारों, ग्रामीणों और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को शुद्ध व शीतल पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाखों रुपये की लागत से स्वच्छ जल वाटर सबमर्सिबल सौर ऊर्जा प्लांट स्थापित किया गया था। लेकिन विडंबना देखिए कि करोड़ों का सालाना बजट ठिकाने लगाने वाली इस नगर पंचायत का यह सौर ऊर्जा प्लांट आज पूरी तरह दम तोड़ चुका है और आम जनता के लिए महज एक सफेद हाथी बनकर खड़ा है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए बताया कि इस महत्वाकांक्षी सौर ऊर्जा जल प्लांट का निर्माण वर्ष 2024 में कराया गया था। इसका भव्य लोकार्पण उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री (समाज कल्याण विभाग) व ओबरा विधायक माननीय संजीव गोंड के कर-कमलों द्वारा बेहद उत्साह के साथ किया गया था। लोकार्पण के वक्त मंच से बड़े-बड़े प्रशासनिक दावे किए गए थे कि इस चौराहे से गुजरने वाले हजारों लोगों को अब तपती धूप और रिकॉर्डतोड़ गर्मी में पानी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। लेकिन हकीकत के धरातल पर इन दावों की पोल खुलने में चंद दिन भी नहीं लगे। उद्घाटन के कुछ समय बाद ही यह प्लांट कथित तकनीकी खराबी की भेंट चढ़कर बंद हो गया। आज जब आसमान से आग बरस रही है और पारा रिकॉर्ड स्तर पर है, तब इस चौराहे पर आने-जाने वाले लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं और जेब ढीली कर निजी दुकानों से पानी खरीदने को मजबूर हैं। यह समस्या इसलिए और अधिक गंभीर हो जाती है क्योंकि शारदा मंदिर चौराहा ओबरा शहर, स्थानीय तहसील और प्रमुख डिग्री कॉलेज को जोड़ने वाला मुख्य केंद्र बिंदु है। इसी मार्ग से होकर प्रतिदिन हजारों की संख्या में छात्र-छात्राएं, राहगीर, ग्रामवासी और शहर के लोग गुजरते हैं। भीषण गर्मी के इस दौर में जब छात्र और ग्रामीण इस चौराहे पर पहुंचते हैं, तो बंद पड़े इस आलीशान जल प्लांट को देखकर उनका सिस्टम पर से भरोसा उठ जाता है। लोग हैरान हैं कि वर्ष 2024 में बना चमचमाता प्लांट आखिर इतनी जल्दी कैसे कबाड़ में तब्दील हो गया और इसे ठीक कराने की सुध क्यों नहीं ली जा रही। इस गंभीर पेयजल संकट को लेकर स्थानीय जागरूक नागरिकों द्वारा ओबरा नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी (EO) अखिलेश सिंह से कई बार लिखित और मौखिक रूप से शिकायत की जा चुकी है। हर बार की तरह अधिकारियों द्वारा जल्द ही प्लांट को दुरुस्त कराने का खोखला ढाढस तो दिया जाता है, लेकिन धरातल पर नतीजा हमेशा सिफ़र (शून्य) ही रहता है। जिम्मेदार अधिकारियों की इस हठधर्मी और संवेदनहीन कार्यशैली से जनता का आक्रोश अब सातवें आसमान पर पहुंच गया है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि ओबरा नगर पंचायत के अध्यक्ष और जिम्मेदार अधिकारी आखिर किस बड़े जन-आंदोलन या अनहोनी के बाद अपनी गहरी नींद से जागेंगे। शारदा मंदिर चौराहे पर ठप पड़े इस वाटर प्लांट को लेकर स्थानीय निवासियों और व्यापारियों ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है और सीधे तीन सवाल दागे हैं। जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये फूंकने के बाद भी अगर यह प्लांट महीनों से बंद पड़ा है, तो इस भारी लापरवाही का ईमानदार जिम्मेदार कौन है। जिस प्रोजेक्ट का लोकार्पण खुद सूबे के माननीय राज्य मंत्री ने किया हो, उसे स्थानीय अधिकारी इस तरह कूड़े के ढेर में तब्दील करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? क्या यह सीधे शासन के आदेशों की अवहेलना नहीं है ।क्या उत्तर प्रदेश की इस सबसे अमीर नगर पंचायतों में शुमार ओबरा के पास एक मामूली सबमर्सिबल या सोलर पैनल की तकनीकी खराबी दूर करने का बजट नहीं है, या फिर जानबूझकर राहगीरों और छात्रों की प्यास का सौदा किया जा रहा है। जनता की पुरजोर मांग है कि इस रिकॉर्डतोड़ गर्मी को देखते हुए शारदा मंदिर चौराहे पर लगे सौर ऊर्जा जल प्लांट को तत्काल प्रभाव से युद्धस्तर पर ठीक कराकर चालू किया जाए। यदि एक सप्ताह के भीतर पेयजल आपूर्ति सुचारू नहीं की गई, तो स्थानीय जनता और व्यापारी मिलकर नगर पंचायत कार्यालय का घेराव करेंगे और अनिश्चितकालीन तालाबंदी के लिए बाध्य होंगे, जिसकी समस्त जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और अधिशासी अधिकारी की होगी।
ओबरा करोड़ों के बजट वाली नगर पंचायत में प्यास का पहरा, शारदा मंदिर चौराहे पर सफेद हाथी बना लाखों का सौर ऊर्जा जल प्लांट
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