हर साल, विश्व स्तनपान सप्ताह हमें उस सबसे आसान और असरदार तरीके की याद दिलाता है, जिससे हर बच्चे को जीवन की सबसे अच्छी शुरुआत मिल सकती है। यह जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने, शुरुआती छह महीनों तक बच्चों को केवल माँ का दूध पिलाने और दो साल या उससे अधिक उम्र तक अन्य खाद्य पदार्थों के साथ-साथ स्तनपान जारी रखने के महत्व पर ज़ोर देता है। इस साल की थीम, “जीवन की टिकाऊ शुरुआत के लिए स्तनपान: कारगर उपायों को मज़बूत करना,” बच्चों के जीवित रहने, माँ की सेहत और टिकाऊ विकास के लिए स्तनपान को बढ़ावा देने और उसका समर्थन करने की ज़रूरत को उजागर करती है।
स्तनपान को अक्सर प्रकृति का पहला टीका कहा जाता है, लेकिन असल में यह उससे कहीं ज़्यादा है। यह सही पोषण देता है, संक्रामक बीमारियों से बचाता है, दिमागी विकास में मदद करता है, बाद के जीवन में मोटापे और गैर-संचारी रोगों के जोखिम को कम करता है और स्तन तथा ओवेरियन कैंसर और टाइप 2 डायबिटीज के खतरे को कम करके माँ की सेहत में भी योगदान देता है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-6 के डेटा से पता चलता है कि भारत में स्तनपान से जुड़े आंकड़ों में काफी सुधार हुआ है। जन्म के बाद पहले घंटे के भीतर बच्चे को स्तनपान कराने की शुरुआत, जिसे ‘अर्ली इनिशिएशन’ कहा जाता है, 41.8% से बढ़कर 50.1% हो गई है। यह एक बड़ी प्रगति है, क्योंकि पहला घंटा माँ और बच्चे के बीच जुड़ाव बनाने, जीवन के पहले 6 महीनों तक सिर्फ स्तनपान सुनिश्चित करने और नवजात शिशु की रोग-प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी को मज़बूत करने के लिए बहुत ज़रुरी होता है।
अक्सर स्तनपान को सिर्फ माँ की ज़िम्मेदारी माना जाता है, लेकिन असल में यह एक साझा ज़िम्मेदारी है। माताओं को सही सहयोग की भी ज़रूरत होती है। उन्हें गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कुशल परामर्श की ज़रूरत होती है, ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़े और वे आम मुश्किलों का सामना कर सकें। जब मुश्किलें आती हैं, तो प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों और स्तनपान से जुड़ी मदद तक पहुँच काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। परिवारों की भी इसमें अहम भूमिका होती है, वे माताओं का हौसला बढ़ा सकते हैं, घर के कामों में हाथ बँटा सकते हैं और एक सहयोगी माहौल बना सकते हैं। कामकाजी माताओं के लिए, काम की जगह पर वेतन के साथ मातृत्व अवकाश, काम के बेहतर तरीके, स्तनपान के लिए ब्रेक और स्तनपान ब्रेस्ट मिल्क निकालने व उसे सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षित और निजी जगह जैसी सहयोगी नीतियां ज़रूरी हैं। जब परिवार, समुदाय, स्वास्थ्य प्रणालियाँ, नियोक्ता और सरकारें मिलकर काम करते हैं, तो माताएं बेहतर ढंग से और सफलतापूर्वक स्तनपान करा पाती हैं, जिससे हर बच्चे को जीवन की सबसे स्वस्थ शुरुआत मिलती है।
एनएफएचएस-4 और एनएफएचएस-5 के डेटा का विश्लेषण करने वाली एक स्टडी में पाया गया कि जिन माताओं ने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए डॉक्टर के पास ज़्यादा विज़िट किए और जिन्होंने सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चे को जन्म दिया, उनमें अपने बच्चों को सिर्फ स्तनपान कराने की संभावना ज़्यादा थी। इसके उलट, 20 साल से कम उम्र की माताओं, कम वज़न के साथ पैदा हुए बच्चों और जन्म के एक घंटे से ज़्यादा समय बाद स्तनपान शुरू करने के मामलों में सिर्फ स्तनपान कराने की संभावना कम थी। ये नतीजे बताते हैं कि स्वास्थ्य प्रणाली से मिलने वाली अच्छी काउंसलिंग और मदद माताओं को सफलतापूर्वक स्तनपान कराने में कितनी अहम भूमिका निभा सकती है।
चूंकि इस साल की थीम “जो कारगर है, उसे मज़बूत करना” पर ज़ोर देती है, इसलिए पहले से चल रही पहलों को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाना ज़रूरी है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत पोषण अभियान बच्चों के खान-पान के अपर्याप्त और गलत तरीकों को ठीक करने के लिए व्यवहार परिवर्तन संचार (बीसीसी) को एक मुख्य रणनीति मानता है। सालाना पोषण माह और पोषण पखवाड़ा अभियानों के ज़रिए, इस कार्यक्रम ने जागरूकता बढ़ाकर, काउंसलिंग सेवाओं को मज़बूत करके और फ्रंटलाइन वर्कर्स की भागीदारी बढ़ाकर स्तनपान और बच्चों के खान-पान के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया है। हालाँकि, समुदाय आधारित मंचों के साथ बेहतर तालमेल बिठाकर इन प्रयासों को और मज़बूत करने की ज़रूरत है।
अनुमान है कि सही तरीके से स्तनपान न कराने के कारण हर साल डायरिया और गंभीर श्वसन संक्रमण से 73,417 बच्चों की मौत हो जाती है, साथ ही इससे सालाना लगभग US$16.6 बिलियन का आर्थिक बोझ भी पड़ता है। 2030 तक 70% केवल स्तनपान के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करने की ज़रूरत है, जो माताओं के सामने आने वाली मुश्किलों को दूर करने में मदद करें और उन्हें शुरुआती, एक्सक्लूसिव और लगातार स्तनपान के सुझाए गए तरीकों को अपनाने के लिए ज़रूरी सहयोग दें।
ग्लोबल ब्रेस्टफीडिंग कलेक्टिव कई तरह के नीतिगत उपायों की माँग करता है, जिनमें शुरुआती, एक्सक्लूसिव और लगातार स्तनपान की दर बढ़ाने के लिए ज़्यादा फंडिंग, नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त जुर्माना लगाकर और अलग-अलग क्षेत्रों में इन्फेंट मिल्क सब्स्टिट्यूट्स (आईएमएस) एक्ट को बेहतर ढंग से लागू करके इसे मज़बूत करना, सभी कर्मचारियों के लिए ज़्यादा पेड लीव और कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएँ, मैटरनिटी केंद्रों में सफल स्तनपान के 10 चरणों को अपनाना, कुशल स्तनपान काउंसलिंग तक बेहतर पहुँच, जिसे स्वास्थ्य केंद्रों और समुदायों के बीच मज़बूत तालमेल से और बेहतर बनाया जाए और स्तनपान के लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति पर नज़र रखने के लिए मज़बूत निगरानी व्यवस्था बनाना शामिल हैं।
इस साल की थीम, “जो कारगर है, उसे मज़बूत करना”, भारत में चल रही कई कोशिशों में पहले से ही नज़र आती है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय स्तनपान के संदेशों को बड़े पैमाने पर फैलाने के लिए बीसीसी और सूचना, शिक्षा और संचार अभियान चला रहा है। साथ ही, फार्मूला दूध की आक्रामक मार्केटिंग को रोकने के लिए आईएमएस एक्ट को सख्ती से लागू करने की कोशिशें भी की जा रही हैं। ज़मीनी स्तर पर, पोषण ट्रैकर जैसे डिजिटल समाधान न केवल आंगनवाड़ी सेवाओं की असरदार निगरानी में मदद करते हैं, बल्कि ऐप में ऐसे टूल भी देते हैं, जिनसे घर पर लोगों के बीच बातचीत और बच्चे के जन्म से ही स्तनपान से जुड़े आंकड़ों को ट्रैक किया जा सके। हाल ही में शुरू किया गया होम विज़िट शेड्यूलर, जो हेल्थ वर्करों के साथ मिलकर घर के दौरे की योजना बनाता है और बेनिफिशियरी मॉड्यूल, जिसमें लाभार्थी जानकारी वाले वीडियो देख सकते हैं, ऐसी ही कुछ पहल हैं, जो पहले से ही लागू हैं। स्वास्थ्य और पोषण प्रणालियों में इन कोशिशों को मज़बूत करना भारत में स्तनपान के अंतर को कम करने और भारत के अपने पोषण लक्ष्यों के साथ-साथ 2030 के वैश्विक लक्ष्य को पूरा करने के लिए बेहद ज़रूरी है।
कारगर उपायों को बेहतर बनाना: भारतीय संदर्भ में स्तनपान में सुधार- डॉ. अश्वथी विजयकुमार एवं सुश्री नेहा गेही
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