नई दिल्ली/लखनऊ सोनभद्र देश में लंबे समय से लंबित पुलिस सुधारों को लेकर भारतीय अहिंसा सेवा संस्थान ने एक बेहद सजग और महत्वपूर्ण मुहिम की शुरुआत की है। संगठन का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए पुलिस का राजनीतिकरण बंद होना चाहिए और उसे सत्ता के बजाय सीधे जनता के प्रति जवाबदेह बनना होगा।
इस मुहिम के तहत संगठन के कार्यकर्ताओं ने नेता जी चौक पर पोस्टर और बैनर के माध्यम से आम जनता को जागरूक किया। इसके साथ ही, व्यवस्था में बड़े प्रशासनिक बदलाव की मांग को लेकर देश के माननीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को एक विस्तृत मांग पत्र भी प्रेषित किया है। संगठन के अध्यक्ष, प्रखर छात्र नेता और जनतासेवक विजय शंकर यादव ने पुलिस की मौजूदा स्थिति और उसकी साख पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी हमारी पुलिस की औपनिवेशिक (अंग्रेजों के जमाने की) कार्यशैली में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ सका है। पुलिस अमूमन सत्तारूढ़ सरकार के निर्देशों को ही सब कुछ मान लेती है, जिससे उसकी स्वयं की निष्पक्ष पहचान निरंतर धूमिल पड़ती जा रही है। विजय शंकर यादव ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि आज स्थिति ऐसी हो चुकी है कि पुलिस इस राजनीतिक पहचान को ही अपनी नियति मान चुकी है। जैसे ही राज्य या केंद्र में सरकार बदलती है, पुलिस का नाम, पहचान और कार्यशैली भी उसी के अनुरूप बदल जाती है। आम बोलचाल में अब अमुक दल की पुलिस या अमुक सरकार की पुलिस जैसे ठप्पे पुलिस महकमे पर लगने लगे हैं, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारतीय अहिंसा सेवा संस्थान ने देशव्यापी स्तर पर जनता की पुलिस बनाने के लिए अपने संकल्पित कदम आगे बढ़ा दिए हैं। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि इस बदलाव की राह में समय जरूर लगेगा, लेकिन निरंतर प्रयास और जन-जागरूकता से कामयाबी अवश्य मिलेगी। मुहिम का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी मजबूत और स्वतंत्र कार्यशैली का निर्माण करना है, जहाँ पुलिस राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर सरकार के फैसलों का निष्पक्ष अवलोकन और मूल्यांकन करने की स्थिति में खड़ी हो सके। संस्थान ने पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और निर्भीक बनाने के लिए एक बेहद क्रांतिकारी और व्यावहारिक फॉर्मूला पेश किया है। संगठन की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं। राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह विभाग के प्रमुख सचिव (Principal Secretary – PS) जैसे शीर्ष पदों पर नियुक्ति केवल सत्ता पक्ष की मर्जी से न की जाए। जिलों में जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) की तैनाती व ट्रांसफर प्रक्रिया को भी राजनीतिक प्रभाव से दूर रखा जाए। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही बराबर के स्तंभ होते हैं। इसलिए इन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों के लिए सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल की संयुक्त सहमति को अनिवार्य संवैधानिक दर्जा दिया जाए। वर्तमान व्यवस्था में विपक्ष हमेशा पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई और सत्ता के इशारे पर काम करने का आरोप लगाता है। यदि शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति में विपक्ष की भी हिस्सेदारी होगी, तो पुलिस पर मनमानी करने या किसी राजनीतिक दल के टूल के रूप में काम करने का आरोप नहीं लगेगा। इससे अधिकारियों का मनोबल बढ़ेगा और वे बिना किसी डर या राजनीतिक दबाव के कानून का राज स्थापित कर सकेंगे। संगठन ने साफ तौर पर रेखांकित किया कि संवैधानिक रूप से पुलिस का पहला और अंतिम कर्तव्य जनता की सेवा करना है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है; कार्यशैली के रूप में पुलिस अमूमन सिर्फ सत्ता के साथ खड़ी दिखाई देती है। इस खाई को पाटने के लिए किसी एक वर्ग के प्रयास काफी नहीं होंगे। भारतीय अहिंसा सेवा संस्थान ने पुरजोर अपील की है कि देश की पुलिस व्यवस्था को बेहतर और विश्वसनीय बनाने के लिए।सरकार (सत्ता पक्ष),प्रमुख विपक्षी दल,सामाजिक संगठन, और सभी राजनैतिक दल,
सभी को एक मंच पर आकर, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक सार्थक व ऐतिहासिक पहल की शुरुआत करनी चाहिए।जिसकी सरकार उसकी पुलिस! बेहतर तो ये है सरकार किसी भी दल की हो, पुलिस सिर्फ जनता की हो।
सरकार किसी भी दल की हो, पुलिस सिर्फ जनता की हो— भारतीय अहिंसा सेवा संस्थान की अनूठी मुहिम
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