सोनभद्र। प्राकृतिक संपदा और आदिम संस्कृति की धरती सोनभद्र का चोपन क्षेत्र एक बार फिर अपनों के ही खून से लाल हो चुका है। चोपन थाना क्षेत्र के अंतर्गत सोन नदी के तट पर बसे ग्राम सभा मीतापुर में जो हुआ, उसे केवल प्रायोजित हादसा कहना इस खूनी व्यवस्था को क्लीन चिट देने जैसा होगा। वास्तव में, यह बालू माफियाओं की अंधी भूख और जिला प्रशासन के भ्रष्टाचार का वह गठजोड़ है जिसने तीन निषाद परिवारों के चिरागों को हमेशा के लिए बुझा दिया। नदी और जलस्रोतों पर आश्रित पारंपरिक निषाद समुदाय के एक परिवार में विवाह की खुशियां थीं। मांगलिक समारोह के बाद जब परिवार पारंपरिक स्नान की रस्म के लिए सोन नदी के उस तट पर गया, जिसे वे पीढ़ियों से सुरक्षित मानते आए थे, तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जिसे वे माँ कहते हैं, उसका सीना पोकलैंड मशीनों से इस कदर छलनी किया जा चुका है कि वह उनके मासूमों के लिए जलसमाधि का काल बन चुकी है।
हादसे का शिकार हुए तीन बच्चों की उम्र और उनकी स्थिति सीधे तौर पर इस बात की गवाही देती है कि रेत के अवैध कारोबार ने कितनी बेरहमी से जिंदगियां लील लीं संदीप (उम्र 18 वर्ष) युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा वह लड़का, जो अपने गरीब परिवार के भविष्य का एकमात्र सहारा और उम्मीद था। (शव बरामद) दीपक (उम्र 9 वर्ष) वह मासूम बचपन, जिसकी आंखों ने अभी दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था। (शव बरामद) वीरभद्र उर्फ बोलबम (उम्र 16 वर्ष) वह किशोर जिसकी तलाश में मां-बाप की पथराई और रोती आंखें अब भी सोन नदी की लहरों को निहार रही हैं। (एसडीआरएफ का रेस्क्यू जारी) मीतापुर की यह घटना कोई सामान्य जल-दुर्घटना नहीं है। यह सरकारी तंत्र की लापरवाही से उपजा वह अपराध है जिसने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया। 52 पन्नों की वह नियमावली, जिसे पर्यावरण और इंसानी जिंदगी की रक्षा के लिए बनाया गया था, आज इन मासूमों के खून से सनी हुई है। जब तक दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं होता और जिम्मेदार अधिकारियों की कुर्सियां नहीं छिनतीं, तब तक सोनभद्र की नदियां इसी तरह मासूमों को लीलती रहेंगी और व्यवस्था 4 लाख के चेक थमाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ती रहेगी।
चोपन के मीतापुर में 3 मासूमों की जलसमाधि दुर्घटना नहीं, प्रशासनिक संरक्षण में हुआ प्रायोजित हत्याकांड
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