सोनभद्र (रेणुकूट ब्यूरो)। स्थानीय नगर पंचायत प्रशासन और वन विभाग के बीच आपसी सामंजस्य की घोर कमी और कथित अनदेखी के चलते रेणुकूट विस्तारित क्षेत्र खाडपाथर के निवासी इन दिनों नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। बाबूराम सिंह महाविद्यालय के पीछे स्थित आश्रम तक तो चमचमाती पीसीसी सड़क का निर्माण करा दिया गया है, लेकिन जैसे ही यह रास्ता आश्रम से सटकर खाडपाथर विद्यालय के पीछे स्थित गरीब बस्ती की तरफ बढ़ता है, वन विभाग ने अपनी जमीन का हवाला देकर निर्माण कार्य को बीच में ही रुकवा दिया है। इस अड़ंगे के बाद से स्थानीय नगर पंचायत प्रशासन भी इस गंभीर जनसमस्या से पल्ला झाड़ता नजर आ रहा है, जिससे स्थानीय जनता में भारी आक्रोश व्याप्त है। सड़क निर्माण अचानक रुकने और प्रशासन की इस बेरुखी से नाराज स्थानीय निवासियों का दर्द अब सीधे आक्रोश के रूप में बाहर आ रहा है। बदहाल, नुकीले पत्थरों और गहरे गड्घों से भरे रास्तों पर चलने को मजबूर लोगों ने पूरी व्यवस्था पर सीधे और तीखे सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का कहना है।क्या पक्की सड़कें और रास्ते सिर्फ रसूखदारों और अमीरों की बस्तियों के लिए ही स्वीकृत किए जाते हैं। जब भी हम जैसे गरीबों के मोहल्ले और रास्तों के विकास की बारी आती है, तो प्रशासन और संबंधित विभाग कभी वन भूमि तो कभी एनओसी (NOC) के नाम पर हजार बहाने बनाकर सामने खड़े हो जाते हैं। क्या हमारे बच्चों, बुजुर्गों और हमारी सुरक्षा की इस सिस्टम की नजर में कोई कीमत नहीं है। खरपत्थर के ग्रामीणों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को धन्यवाद देते हुए स्थानीय तंत्र को कटघरे में खड़ा किया। ग्रामीणों ने कहा कि जो लोग सालों से विकास के लिए तरस रहे थे, उन्हें उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार और मुखिया ने ग्रामीण क्षेत्र से नगर पंचायत के विस्तारित क्षेत्र में शामिल कर विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक काम किया था। लेकिन, सरकार की इस बेहतरीन मंशा पर यहाँ के स्थानीय अधिकारी और जनप्रतिनिधि पानी फेर रहे हैं। विकास की गंगा तो दूर, जमीनी हकीकत यह है कि विकास सिर्फ सरकारी फाइलों और कागजों तक ही सिमट कर रह गया है। जनता पूछ रही है कि आखिर क्यों हर बार गरीबों को विकास के नाम पर केवल छला और भटकाया जाता है। सड़क निर्माण का कार्य बीच में ही अधूरा छोड़े जाने के कारण इस कच्चे मार्ग पर बड़े-बड़े गड्ढे और नुकीले पत्थर उभर आए हैं। इससे आए दिन राहगीर और दोपहिया वाहन चालक गिरकर गंभीर रूप से चोटिल हो रहे हैं। वर्तमान में जारी बरसात के दिनों में तो यह रास्ता पूरी तरह से दलदल और तालाब में तब्दील हो जाता है, जिससे लोगों का पैदल चलना भी दूभर हो गया है। स्थानीय बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों ने वन विभाग की इस हठधर्मिता पर बेहद तार्किक सवाल उठाते हुए कहा कि यदि यह रास्ता पक्का बन जाता है, तो क्या वन विभाग (फॉरेस्ट) के अधिकारियों और कर्मचारियों को खुद क्षेत्र में गश्त करने या आने-जाने में सुविधा नहीं होगी। एक पक्की सड़क बनने से पर्यावरण को कोई नुकसान होने के बजाय क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा और अधिक सुदृढ़ होगी।ग्रामीणों का सबसे बड़ा गुस्सा चुनाव के समय किए जाने वाले खोखले वादों और सरकारी फंड के दुरुपयोग को लेकर फूटा है। पीड़ित जनता ने तीखे शब्दों में कहा जब हमसे वोट लेना होता है, तो यही जनप्रतिनिधि लोग हमारे पैरों में गिरते हैं और वादा करके जाते हैं कि जीतने के बाद हर काम पूरा होगा। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही लोग कहते हैं कि यहाँ कोई काम नहीं हो सकता। आखिर ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों। जनता के टैक्स के पैसे से ही देश का हर विकास होता है। सरकार से फंड भी पास करवा लिया जाता है, मगर वह जमीन पर लगने के बजाय कागजों में ही रह जाता है। फिर जनता का विकास करने का वादा करके ये विकासवादी नेता और जिम्मेदार अधिकारी क्यों पीछे हट जाते हैं। कुछ बड़े अधिकारियों की रहस्यमयी खामोशी भी कई तरह के संदेह पैदा करती है। इस पूरे मामले में नगर पंचायत प्रशासन का पारंपरिक तर्क है कि संबंधित जमीन वन विभाग के अंतर्गत आती है, इसलिए वहां निर्माण कार्य कराना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। वहीं दूसरी तरफ, पीड़ित जनता का सीधा आरोप है कि नगर पंचायत इस मुद्दे को लेकर कतई गंभीर नहीं है। अगर स्थानीय प्रशासन और नगर पंचायत चेयरमैन चाहते, तो वन विभाग के आला अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक कर जनहित में इस छोटे से टुकड़े के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) हासिल कर सकते थे, लेकिन किसी ने भी गरीबों की इस बुनियादी और बेहद जरूरी समस्या की सुध लेना मुनासिब नहीं समझा। आक्रोशित ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और सोनभद्र के जिलाधिकारी से मांग की है कि इस जनहित के मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए। वन विभाग और नगर पंचायत के इस आपसी पेंच को टेबल पर बैठकर सुलझाया जाए और खाडपाथर विद्यालय के पीछे जाने वाले इस मुख्य रास्ते का निर्माण कार्य जल्द से जल्द पूरा कराया जाए, ताकि सैकड़ों की इस आबादी को इस नारकीय दलदल और पथरीले रास्ते से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके और सरकार के फंड का सही इस्तेमाल जमीन पर दिखाई दे।
रेणुकूट के खाडपाथर में अधूरी सड़क देख भड़के गरीब, पूछा क्या पक्के रास्ते सिर्फ अमीरों के लिए बनते हैं।
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