भांवरकोल (दृष्टि उजागर)। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने समय का नेतृत्व नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाते हैं। शेरपुर कला ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान स्वर्गीय महेंद्र प्रसाद राय ऐसे ही व्यक्तित्वों में शामिल थे। उनका जीवन किसी राजनीतिक पद की कहानी नहीं, बल्कि जनविश्वास, सेवा, संघर्ष और नेतृत्व का ऐसा अध्याय है, जिसे शेरपुर ही नहीं बल्कि पूरा पूर्वांचल आज भी सम्मान के साथ याद करता है।
यह कहानी किसी कुर्सी की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है जो पीढ़ियों तक चलता है। यह कहानी उस व्यक्ति की है, जिसने सत्ता को अपने व्यक्तित्व से बड़ा नहीं होने दिया। गांव की धूल, खेतों की मेड़, बाढ़ का पानी, सूखे की मार और आम लोगों की उम्मीदों के बीच खड़ा एक नाम था बाबू महेंद्र प्रसाद राय।
1922 में जन्मा वह बालक, जो आगे चलकर शेरपुर की पहचान बना….
सन् 1922 में मानसिंह राय पट्टी के गोविंद राय घराने में जन्मे महेंद्र प्रसाद राय के पिता स्वर्गीय रामनरेश राय थे। बचपन से ही उनमें नेतृत्व के गुण दिखाई देते थे। खेती-किसानी से विशेष लगाव था और गांव की समस्याओं को समझने की क्षमता भी। पढ़ाई में तेज और खेलकूद में निपुण महेंद्र राय ऊंची कूद और लंबी कूद के लिए भी जाने जाते थे। गांव के लोग बताते हैं कि उनमें बचपन से ही अनुशासन, साहस और निर्णय क्षमता दिखाई देती थी।
सरकारी नौकरी छोड़ी, जनता की सेवा चुनी….
देश आजाद होने के बाद पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई। कुछ समय तक उन्होंने पंचायत व्यवस्था में नौकरी भी की, लेकिन उनका मन नौकरी में नहीं लगा। वे सीधे लोगों के बीच रहकर काम करना चाहते थे। यही कारण रहा कि वर्ष 1955 में उन्होंने ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा और जनता ने उन्हें अपना नेता चुन लिया।
इसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, वह लगातार चार दशकों तक चला। जनता का विश्वास इतना मजबूत था कि वे 40 वर्षों से अधिक समय तक ग्राम पंचायत का नेतृत्व करते रहे।
41 वर्षों तक पंचायत का नेतृत्व, बिना किसी विवाद के कायम रही लोकप्रियता…..
लगातार 41 वर्षों तक ग्राम प्रधान बने रहना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। यह उस दौर की बात है जब पंचायत चुनावों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी होती थी और सामाजिक चुनौतियां भी कम नहीं थीं। इसके बावजूद महेंद्र राय का जनाधार लगातार मजबूत बना रहा।
उनके दरबार में आने वाला हर व्यक्ति न्याय की उम्मीद लेकर आता था और संतुष्ट होकर लौटता था। गांव में किसी का खेत विवाद हो, पारिवारिक झगड़ा हो या सामाजिक मतभेद, बाबू साहब का फैसला अंतिम माना जाता था।
सूखा, बाढ़ और संकट के दौर में बने जनता की ढाल…..
महेंद्र प्रसाद राय का कार्यकाल केवल विकास कार्यों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कई कठिन दौर भी देखे।
- 1966 का भीषण सूखा
- 1967 की विनाशकारी बाढ़
- 1978 की भयावह बाढ़
- 1975 का नक्सल आंदोलन और सामाजिक तनाव
इन सभी परिस्थितियों में वे गांव और क्षेत्र के लोगों के साथ मजबूती से खड़े रहे। जब लोग संकट में थे, तब बाबू साहब समाधान बनकर सामने आए।
नक्सल प्रभाव को रोकने में निभाई निर्णायक भूमिका….
1970 के दशक में बिहार से नक्सली विचारधारा का प्रभाव पूर्वांचल के सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचने लगा था। उस समय शेरपुर और आसपास के क्षेत्रों में भी नक्सल गतिविधियों की आहट सुनाई देने लगी थी।
ग्रामीणों के अनुसार महेंद्र प्रसाद राय ने अपनी सामाजिक स्वीकार्यता, संवाद क्षमता और मजबूत नेतृत्व के बल पर क्षेत्र में नक्सल प्रभाव को बढ़ने से रोका। उन्होंने युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने और सामाजिक एकता बनाए रखने का कार्य किया। यही कारण रहा कि शेरपुर क्षेत्र नक्सली प्रभाव से काफी हद तक सुरक्षित रहा।
चकबंदी के दौरान दिखाई असाधारण प्रशासनिक क्षमता….
1975 में देश में आपातकाल लागू था। उसी दौरान शेरपुर जैसी विशाल पंचायत में चकबंदी का कार्य चल रहा था। चकबंदी के दौरान अक्सर किसानों के बीच विवाद पैदा हो जाते हैं, लेकिन महेंद्र राय ने अपनी सूझबूझ और धैर्य से पूरे कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कराया।
आज भी बुजुर्ग किसान उस दौर को याद करते हुए कहते हैं कि यदि बाबू साहब का नेतृत्व नहीं होता तो चकबंदी का कार्य वर्षों तक विवादों में उलझा रहता।
लखनऊ तक थी पहुंच, लेकिन गांव कभी नहीं छोड़ा….
बाबू महेंद्र राय की राजनीतिक और सामाजिक पहचान केवल शेरपुर तक सीमित नहीं थी। उनकी पहुंच गाजीपुर से लेकर लखनऊ तक थी। प्रदेश के बड़े नेता जब भी क्षेत्र में आते, उनसे मुलाकात अवश्य करते थे।
लेकिन इतनी प्रतिष्ठा और प्रभाव के बावजूद उन्होंने कभी गांव से दूरी नहीं बनाई। वे हमेशा गांव की चौपाल पर आम लोगों के बीच बैठे दिखाई देते थे।
धर्म, समाज और सेवा के प्रति समर्पित जीवन….
राजनीति के साथ-साथ उनका झुकाव अध्यात्म की ओर भी था। हरिकीर्तन, यज्ञ, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी रहती थी।
प्रधान पद छोड़ने के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय श्रीसीताराम बैंक, अयोध्या से जुड़कर “सीताराम” नाम लेखन का अनूठा कार्य किया। छह वर्षों में उन्होंने एक करोड़ तीन लाख बार “सीताराम” नाम लिखकर 2002 में अयोध्या से स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
जनसेवा की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं उनके पुत्र….
महेंद्र प्रसाद राय की विरासत उनके पुत्रों ने भी आगे बढ़ाई।
उनके तीन पुत्र हैं.
- जयप्रकाश राय
- प्रेम प्रकाश राय
- स्व. नागेंद्र प्रसाद राय
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक जयप्रकाश राय वर्ष 2005 से 2010 तक ग्राम प्रधान रहे। बाद में पंचायत आरक्षण के कारण चुनावी समीकरण बदले, लेकिन परिवार की जनसेवा जारी रही।
वर्ष 2015 में सामान्य महिला सीट होने पर मंजू राय ग्राम प्रधान निर्वाचित हुईं। पंचायत संचालन में जयप्रकाश राय की महत्वपूर्ण भूमिका रही और विकास कार्यों को आगे बढ़ाया गया।
आज भी गांव की स्मृतियों में जीवित हैं बाबू साहब….
स्व. महेंद्र प्रसाद राय को लोग केवल पूर्व प्रधान के रूप में नहीं, बल्कि एक संस्था, एक विचार और एक युग के रूप में याद करते हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा नेतृत्व पद से नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास से बनता है।
आज उनकी पुण्यतिथि पर शेरपुर की मिट्टी अपने उस सपूत को श्रद्धापूर्वक नमन कर रही है, जिसने अपना पूरा जीवन गांव, समाज और जनता के लिए समर्पित कर दिया।
कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ इतिहास लिखते हैं, लेकिन बाबू महेंद्र प्रसाद राय उन लोगों में थे, जो स्वयं इतिहास बन जाते हैं।

