सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े खनिज बहुल जिलों में शुमार सोनभद्र की खनन व्यवस्था में उस समय भूचाल आ गया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया। सोनभद्र जनपद में बहुचर्चित खनन पट्टा ई-नीलामी प्रक्रिया में प्रशासनिक सांठगांठ और खनन सिंडिकेट के बड़े खेल का पर्दाफाश हुआ है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए सोनभद्र जिला प्रशासन की मनमानी कार्रवाई को सिरे से खारिज कर दिया है। माननीय न्यायालय ने न सिर्फ जिलाधिकारी (डीएम) द्वारा जारी किए गए लेटर ऑफ इंटेंट (LOI) को निरस्त कर दिया, बल्कि जिला प्रशासन और खनन माफियाओं के बीच की कथित कड़ियों पर भी बेहद तल्ख टिप्पणियां की हैं। जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा कि पूरी ई-नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाई गईं। जानबूझकर अधिक बोली लगाने वाली योग्य कंपनियों को तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर रेस से बाहर किया गया, ताकि कम बोली लगाने वाले चहेतों को अनुचित लाभ पहुंचाया जा सके। माननीय न्यायालय ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता कांत कंस्ट्रक्शन कंपनी और रुद्रा एंटरप्राइजेज के पक्ष में तत्काल नया एलओआई (LOI) जारी करें। इस पूरे घोटाले की टाइमलाइन और आंकड़ों पर नजर डालें तो भ्रष्टाचार का एक तय पैटर्न नजर आता है। 12 जनवरी 2026 को सोनभद्र के विभिन्न महत्वपूर्ण खनन क्षेत्रों के लिए ई-नीलामी की विज्ञप्ति जारी की गई थी। इस नीलामी में पारदर्शिता और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की उम्मीद थी, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। खनन पट्टे के लिए कांत कंस्ट्रक्शन कंपनी ने 1051 रुपये प्रति घन मीटर की सबसे ऊंची (Highest) बोली लगाकर सबको चौंका दिया था। इस क्षेत्र के लिए प्रशासन द्वारा तय किया गया बेस प्राइस (Base Price) मात्र 165 रुपये प्रति घन मीटर था। इतनी ऊंची बोली आने के बाद सिंडिकेट में खलबली मच गई। इसके बाद कंपनी की बोली को इस तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया गया कि उसने एफिडेविट (शपथ पत्र), डिमांड ड्राफ्ट (DD) और चालान की हार्ड कॉपी जमा नहीं की है। कांत कंस्ट्रक्शन को बाहर का रास्ता दिखाते ही, जिला प्रशासन ने मात्र 207 रुपये प्रति घन मीटर की बेहद कम बोली लगाने वाली कंपनी मां दुर्गा माइनिंग वर्क्स को पट्टा आवंटित कर दिया। यह खेल सिर्फ एक पट्टे तक सीमित नहीं था। दो अन्य महत्वपूर्ण खनन पट्टों के लिए भी 333-333 रुपये प्रति घन मीटर की ऊंची बोलियां प्राप्त हुई थीं। प्रशासन ने उन्हें भी तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया और मात्र 201 रुपये और 202 रुपये प्रति घन मीटर की बोली लगाने वाली कंपनियों को ठेका सौंप दिया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता देवव्रत मुखर्जी ने कोर्ट के सामने पुख्ता सबूतों के साथ जिला प्रशासन की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया। अधिवक्ता मुखर्जी ने दलील दी कि कंपनियों ने नियमानुसार और समय सीमा के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेज ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर दिए थे। इसके साथ ही उनकी फिजिकल हार्ड कॉपी भी संबंधित कार्यालय में जमा करा दी गई थी। खेल तब हुआ जब 24 फरवरी को टेंडर बॉक्स खोला गया और वहां से रहस्यमयी तरीके से दस्तावेज गायब मिले।
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की टाइमलाइन (क्रोनोलॉजी) को समझा और प्रशासन की मंशा पर सीधे सवाल दागे। बोलियां खोलने की आधिकारिक तारीख 24 फरवरी थी, जबकि ऊंची बोलियों को निरस्त करने का नोटिस 25 फरवरी को जारी हुआ।कोर्ट ने माना कि पहले सभी कॉमर्शियल बोलियों (Financial Bids) को खोलकर देख लिया गया कि किसने कितनी ऊंची रकम लगाई है। जब देखा गया कि सिंडिकेट से बाहर की कंपनियों ने बहुत ऊंची बोली लगा दी है, तो अगले ही दिन तकनीकी त्रुटि का हथकंडा अपनाकर उन्हें रेस से बाहर कर दिया गया। राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन कोर्ट में इस बात का कोई ठोस या स्पष्ट खंडन नहीं कर सके कि याचिकाकर्ताओं ने मूल दस्तावेज जमा नहीं किए थे। कोर्ट ने साफ कहा कि दफ्तर से दस्तावेज गायब किए जाने की आशंका से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले को कानूनी मजबूती देने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के प्रसिद्ध शांति कंस्ट्रक्शन मामले के फैसले का हवाला दिया।
न्यायालय ने रेखांकित किया कि किसी भी सार्वजनिक संपत्ति या खनन की नीलामी प्रक्रिया का मूल और प्राथमिक उद्देश्य राज्य के राजस्व (State Revenue) को अधिकतम करना होता है। तकनीकी त्रुटियों या मामूली कमियों के नाम पर सबसे ऊंची बोली लगाने वालों (H1 Bidder) को बाहर करना पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण और जनहित के खिलाफ है। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जहां उत्तर प्रदेश सरकार और सोनभद्र के खजाने को 1051 रुपये प्रति घन मीटर की दर से भारी-भरकम राजस्व मिल सकता था, वहां महज 207 रुपये में पट्टा देकर न सिर्फ नियमों को ताक पर रखा गया, बल्कि सरकारी खजाने को भी करोड़ों रुपये का सीधा नुकसान (Loss to Exchequer) पहुंचाया गया। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़े एक और महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को हमेशा के लिए बंद कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन भूमियों पर खनन पट्टे के लिए ई-निविदा (E-Tender) आमंत्रित की गई थी, वहां के मूल भूमि स्वामियों (Landowners) को दिया गया अंतिम अवसर अब समाप्त माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला
नियमों के मुताबिक, भूमि स्वामियों को यह विकल्प दिया गया था कि वे सबसे ऊंची बोली से एक रुपया अधिक की दर लगाकर खुद पट्टा ले सकते हैं, जिसे कानूनी भाषा में Right of First Refusal कहा जाता है। हालांकि, भूमि स्वामियों ने उस समय इस ऊंची दर पर पट्टा लेने से साफ इनकार कर दिया था और वे कम दर पर पट्टा लेने की ताक में थे। अदालत ने अपने आदेश में साफ कह दिया है कि चूंकि भूमि स्वामियों ने पूर्व में अवसर मिलने पर भी ऊंची दर पर पट्टा स्वीकार नहीं किया, इसलिए अब उनका यह विशेष अधिकार (ROFR) पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। इस बिंदु पर अब भविष्य में कोई नया दावा या कानूनी कार्रवाई स्वीकार्य नहीं होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद सोनभद्र से लेकर लखनऊ तक प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा हुआ है। सूत्रों की मानें तो कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद शासन स्तर पर दोषी अधिकारियों की भूमिका की जांच भी शुरू हो सकती है, क्योंकि मामला सीधे तौर पर राजस्व को चपत लगाने और खनन सिंडिकेट को बढ़ावा देने से जुड़ा है। फिलहाल, कांत कंस्ट्रक्शन और रुद्रा एंटरप्राइजेज के पक्ष में नया एलओआई जारी करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दे दिए गए हैं।

