हापुड़ (मनीष कुमार) काली मस्जिद क्षेत्र में’महिला जागृति फाउंडेशन’ की फाउंडर गीता पैट्रिक ने स्थानीय परिवारों से मुलाकात की। इस दौरान उनका भव्य और आत्मीय स्वागत किया गया। कार्यक्रम में गीता पैट्रिक ने क्षेत्रवासियों को ‘अस्सलामु अलैकुम’ कहकर अभिवादन किया और उनके बीच बैठकर सादगी व सम्मानपूर्ण व्यवहार की एक नई मिसाल पेश की इस अवसर पर उन्होंने ईद-उल-अज़हा (बकरीद) के ऐतिहासिक महत्व, वास्तविक संदेश और सामाजिक मूल्यों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि बकरीद केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह त्याग, समर्पण, मानवता, सेवा और आपसी भाईचारे का संदेश देने वाला एक महान पर्व है गीता पैट्रिक ने ‘ईद-उल-अज़हा’ का अर्थ समझाते हुए कहा कि “ईद” का मतलब खुशी और “अज़हा” का मतलब कुर्बानी या त्याग है। उन्होंने हज़रत इब्राहीम के ऐतिहासिक वाक्ये का जिक्र करते हुए कहा कि यह त्योहार हमें ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण की याद दिलाता है।
”कुर्बानी का असली संदेश केवल पशु की रस्म तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ अपनी बुरी आदतों, अहंकार, लालच और नफरत का त्याग करना है। जब तक हम अपने भीतर के स्वार्थ को छोड़कर मानवता की सेवा के लिए आगे नहीं आते, तब तक त्योहार का उद्देश्य अधूरा रहता है भारत की सांस्कृतिक विविधता की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा देश अनेक धर्मों और भाषाओं का गुलदस्ता है। बकरीद हमें सिखाती है कि हम एक-दूसरे के त्योहारों का सम्मान करें और समाज में प्रेम व सद्भाव को बढ़ावा दें। इंसान की असली पहचान उसके धर्म या जाति से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और कर्मों से होती है।
महिला जागृति फाउंडेशन की फाउंडर गीता पैट्रिक ने दिया भाईचारे का संदेश
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