ओबरा की मिट्टी से जुड़ी एक अनमोल कहानी
किसी भी समाज या शहर का असली वैभव उसकी ऊंची-ऊंची भव्य इमारतों, चौड़ी सड़कों या धन-दौलत से नहीं मापा जाता। किसी नगर की वास्तविक पहचान वहाँ रहने वाले उन महान व्यक्तित्वों से होती है जो अपने निस्वार्थ कर्मों, सद्भावना और सादगी से जन-जन के दिलों में बस जाते हैं। सोमभद्र की पावन धरा पर बसे ओबरा नगर पंचायत के इतिहास और यहाँ की फिज़ाओं में कई नाम आए और गए, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो चुके हैं जिन्हें समय की धूल भी धुंधला नहीं कर सकती। उन्हीं में से एक अत्यंत आदरणीय, निष्ठावान, जनप्रिय और सर्वप्रिय नाम है, स्व. संतोष जी। केवल ओबरा नगर पंचायत के एक सामान्य नागरिक या जन-प्रतिनिधि मात्र नहीं थे। वे साक्षात आत्मीयता, दयालुता और निस्वार्थ सेवा के जीवंत प्रतीक थे। उनका संपूर्ण जीवन समाज की भलाई, शोषितों-वंचितों के कल्याण और ओबरा की खुशहाली के लिए समर्पित रहा। संतोष जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत उनका अत्यंत सरल और सहज स्वभाव था। वे पद, प्रतिष्ठा, छलावे या अहंकार से हमेशा मीलों दूर रहे। उनके लिए कोई अमीर या गरीब, छोटा या बड़ा नहीं था। ओबरा का हर नागरिक उनके अपने परिवार का हिस्सा था। नगर पंचायत की गलियों से जब भी वे गुज़रते, तो बच्चा हो या बुजुर्ग, हर कोई उनसे एक अनोखा अपनापन और आत्मीयता महसूस करता था। उनकी बोली में एक अजीब-सी मिठास, ठहराव और सम्मान था जो पहली ही मुलाकात में सामने वाले का दिल जीत लेता था।नगर के किसी भी नागरिक के घर में कोई खुशी का अवसर हो, संतोष जी सबसे पहले पहुँचकर अपनी शुभकामनाएँ और स्नेह दिया करते थे।यदि किसी परिवार पर अचानक दुखों का पहाड़ टूट पड़े या कोई विपत्ति आ जाए, तो संतोष जी औपचारिकताओं को छोड़कर सबसे मजबूत ढाल बनकर खड़े हो जाते थे। सच मायने में, ओबरा नगर पंचायत के क्षेत्र में उनके जैसा सर्वसुलभ, संवेदनशील और सहृदय व्यक्ति दूसरा कोई नहीं हुआ। ओबरा वासियों के दिलों में संतोष जी का स्थान किसी आम सामाजिक कार्यकर्ता जैसा नहीं, बल्कि परिवार के एक गार्जियन (संरक्षक) और बड़े भाई जैसा था। समाज का हर वर्ग उन्हें एक अलग ही आदर और विश्वास की दृष्टि से देखता था। ओबरा के युवाओं के लिए वे केवल एक वरिष्ठ व्यक्ति नहीं, बल्कि उनके मार्गदर्शक थे। वे युवाओं को हमेशा सही दिशा में चलने, शिक्षा व खेल से जुड़ने और समाज के प्रति निष्ठावान रहने की सीख देते थे।नगर के सम्मानित बुजुर्ग उन्हें अपने सगे बेटे की तरह स्नेह देते थे। जब भी नगर के विकास या किसी बड़े सामाजिक मुद्दे पर कोई निर्णय लेना होता, तो बुजुर्ग सबसे पहले संतोष जी की राय लिया करते थे। साधारण जनता के लिए वे एक ऐसे संरक्षक थे जिनके दरवाज़े दिन हो या रात, कभी किसी के लिए बंद नहीं होते थे। यदि नगर पंचायत में कोई भी समस्या आती चाहे वह प्रशासनिक हो, पारिवारिक हो या सामाजिक लोग बेझिझक संतोष जी के पास ही जाते थे। उन्हें अटूट विश्वास था कि संतोष जी के पास हर मुश्किल का ऐसा न्यायप्रिय समाधान होगा, जिसमें सभी का हित सुरक्षित रहेगा। समय चक्र अपनी गति से निरंतर चलता रहता है, लेकिन जो संस्कार और निष्काम सेवा भाव संतोष जी ने इस मिट्टी में बोए थे, वे आज भी ओबरा की आबोहवा में महक रहे हैं। भौतिक रूप से उनके चले जाने के बाद भी, उनकी यादें आज भी उतनी ही तरोताज़ा हैं। आज भी जब ओबरा नगर पंचायत की गलियों, चौराहों या कार्यालयों में लोग जाते हैं, तो वहाँ संतोष जी की कमी खलती है, लेकिन साथ ही उनकी गरिमामयी मौजूदगी का अहसास भी होता है। लोग आज भी चौराहों पर बैठकर पुराने दिनों को याद करते हैं उनके दिए फैसलों, उनकी मीठी भाषा और हर किसी को साथ लेकर चलने की कला की चर्चा करते हुए कई आँखें आज भी नम हो जाती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि एक पिता का सबसे बड़ा धन धन-दौलत नहीं, बल्कि वे संस्कार और विचार होते हैं जो वे अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपकर जाते हैं। स्व. संतोष जी के सुपुत्र सुधांशु भैया आज इस बात को सौ प्रतिशत चरितार्थ कर रहे हैं। संतोष जी के जाने के बाद ओबरा नगर पंचायत में जो एक खालीपन और आत्मीयता का शून्य पैदा हो गया था, उसे सुधांशु भैया अपनी सादगी और निष्ठा के साथ भरने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। आज जब स्थानीय निवासी नगर पंचायत के किसी कार्य में या सामाजिक आयोजनों में सुधांशु भैया को देखते हैं, तो उन्हें उनमें संतोष जी की ही छवि और उनके ही संस्कार नज़र आते हैं। वही नम्रता, वही चेहरे पर शांत मुस्कान, बुजुर्गों के प्रति वही आदर और आम जनता की समस्याओं को धैर्य से सुनकर हल करने की तत्परता सुधांशु भैया के व्यवहार में हूबहू दिखाई देती है। ओबरा के नागरिक आज अक्सर यह कहते हुए सुने जाते हैं। सुधांशु भैया के रूप में आज भी संतोष जी हमारे बीच मौजूद हैं। यह केवल दो लोगों की तुलना भर नहीं है, बल्कि ओबरा की जनता का वह अटूट विश्वास और भावनात्मक लगाव है जो वे कल तक संतोष जी से रखते थे और आज वही सम्मान व भरोसा सुधांशु भैया में देख रहे हैं। सुधांशु भैया ने अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए न केवल उस जनसेवा की मशाल को रोशन रखा है, बल्कि ओबरा वासियों के मान-सम्मान को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। स्व. संतोष जी का जीवन हम सभी के लिए इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इंसान अपनी गाड़ियों, मकानों या ऊंचे प्रशासनिक पदों से अमर नहीं होता। वह अमर होता है अपने निस्वार्थ कर्मों, मानवीय संवेदनाओं और नम्र स्वभाव से। सत्ता और पद आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो जगह लोगों के दिलों में प्यार और भरोसे से बनाई जाती है, उसे काल की कोई सीमा मिटा नहीं सकती। ओबरा नगर पंचायत अपने इस अनमोल रत्न पर कल भी गर्व करती थी और आज भी उतनी ही शिद्दत से गर्व करती है। संतोष जी के विचार, उनकी निस्वार्थ जनसेवा और उनके द्वारा दिए गए संस्कार ओबरा के हर नागरिक के दिल में हमेशा एक दीपशिखा की तरह जलते रहेंगे और उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे।
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