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Home » महापंडित राहुल सांकृत्यायन शोध एवं अध्ययन केंद्र संस्था द्वारा आभासीय पटल से हिंदी पखवाड़ा ‘राहुल सांकृत्यायन और मातृभाषाएं’ विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
वाराणसी

महापंडित राहुल सांकृत्यायन शोध एवं अध्ययन केंद्र संस्था द्वारा आभासीय पटल से हिंदी पखवाड़ा ‘राहुल सांकृत्यायन और मातृभाषाएं’ विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

adminBy adminMonday, 30 September 2024, 12:31 ISTNo Comments6 Mins Read
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Varanasi: कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों का स्वागत और दीप प्रज्ज्वलित किया गया तथा दिल्ली से डॉ महालक्ष्मी केसरी ने वाक् देवी मां सरस्वती की वंदना कर उनका आवाहन किया।
अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्था सचिव डॉ संगीता श्रीवास्तव ने कहा कि राहुल जी ने कहा कि भाषा, विशिष्ट से कुछ लोगों की सर्जना नहीं है, बल्कि जीवंत भाषा जनता के कारखाने में ढलती है जनता द्वारा गढ़े गए शब्दों, मुहावरों और कहावतें को छोड़कर यदि साहित्य रचना का प्रयास किया गया हो तो वह साहित्य निष्पादन होता है’
अपने साहित्य निबंधावली नामक ग्रंथ में उन्होंने 1943 में “मातृभाषाओं की समस्या’ (पृष्ठ 83)नामक लेख में मातृ भाषा का पूर्ण समर्थन किया है और लिखा है कि” मातृभाषा हमारी परिभाषा है जिसके बोलने में अनपढ़ से अनपढ़ आदमी और बच्चा तक भी व्याकरण की गलती ना कर सके बच्चों ने मां के दूध के साथ अपनी मातृभाषा और भाषा के साथ उसके व्याकरण को आप प्रयास ही सीखा है आप इन भाषाओं को हिंदी से अभिन्न नहीं कर सकते’
कार्यक्रम के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा – स्थानीय भाषा अथवा मातृभाषा के महत्व और प्राथमिक शिक्षा में उसकी सार्थकता पर सबसे पहले ध्यान दिलाया राहुल सांकृत्यायन ने।अपनी मातृभूमि की अपनी भाषा को ,पूरी दुनियाभर घूमने और तमाम भाषाओं के पंडित राहुल,नहीं भूलते हैं।
विशिष्ट वक्ता के रूप में वरिष्ठ कवि शिवकुमार पराग ने कहा-
“राहुल सांकृत्यायन ने भाषाओं के समुद्र का अवगाहन किया था. वे 36 भाषाओं के जानकार थे. संस्कृत धाराप्रवाह बोल सकते थे. हिंदी में उन्होंने विपुल लेखन किया. परन्तु अपनी मातृभाषा भोजपुरी के लिए उनके मन में खास जगह थी. यही नहीं, वे जहां भी जाते थे, वहां के लोगों से घुल-मिलकर उनकी मातृभाषा सीखने की कोशिश करते थे. इसी क्रम में उन्होंने बंजारों की भी भाषा सीख ली. यह सब इस बात का द्योतक है कि मातृभाषाओं को वे बहुत मान देते थे.”
वक्ता के रूप में लखनऊ से जुड़ी डॉ स्नेह लता ने कहा कि
राहुल सांकृत्यायन जी की भाषा उनके वैविध्यपूर्ण जीवनशैली के अनुसार रही जिसमें हिन्दी, उर्दू,फ़ारसी,सँस्कृत, भोजपुरी, मैथिली,अवधी के अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का प्रयोग किया।उनकी भाषा जनसाधारण की भाषा थी जिसमें क्लिष्टता का स्थान नहीं था।उन्होंने तकनीकी शब्दावली के लिए अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली को अपनाने पर बल दिया था जो महत्वपूर्ण था।उनके सुझाव पर अमल किया गया होता तो हिन्दी की स्थिति आज अधिक अच्छी होती।
भागलपुर से जुड़ी डॉ मल्लिका मंजरी ने कहा -आचार्य राहुल सांकृत्यायन बहुभाषाविद थे। हिन्दी, संस्कृत, पालि, तिब्बती के साथ सिंहली, बर्मी, रूसी, अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं के भी ज्ञाता थे। अपने लेखन से उन्होंने हिन्दी और पाली भाषा को समृद्ध किया इसके साथ ही वे लोक भाषाओं के विकास और उन्नयन हेतु भी सतत प्रयत्नशील रहे। अवधी,भोजपुरी आदि लोकभाषाओं के साहित्येतिहास लेखन में उनका योगदान अविस्मरणीय है।
वाराणसी के शोध छात्र उज्जवल कुमार सिंह ने कहा –
भाषा चिंतन की भारतीय अवधारणा एक गहन और बहुआयामी दृष्टिकोण पर आधारित है, जो भाषा को केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, और
आध्यात्मिकता के अभिव्यक्ति का साधन मानती है।
राहुल सांकृत्यायन ने अपने भाषा। चिंतन में भाषा के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने भाषा शिक्षा को समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया और यह तर्क दिया कि भाषा शिक्षा समाज में सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने यह भी माना कि भाषा शिक्षा व्यक्ति की मानसिक और बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनके अनुसार, भाषा शिक्षा व्यक्ति की सोच, समझ, और विश्लेषण की क्षमता को विकसित करती है और उसे समाज में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए सक्षम बनाती है।
राहुल सांकृत्यायन का भाषा चिंतन भाषा की अंतरराष्ट्रीयता को भी स्वीकार करता है। उन्होंने विभिन्न भाषाओं के बीच सांस्कृतिक और साहित्यिक आदान-प्रदान को महत्वपूर्ण माना और यह तर्क दिया कि भाषाओं के बीच पारस्परिक संवाद से समाज और संस्कृति को समृद्ध किया जा सकता है। उनके विचार में, भाषा केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे विश्वभर में फैलाना चाहिए, ताकि विभिन्न संस्कृतियों और समाजों के बीच समझ और सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके। उन्होंने यह भी माना कि भाषाओं के बीच संवाद और आदान-प्रदान से नई विचारधाराओं और ज्ञान की उत्पत्ति होती है, जो समाज की प्रगति में सहायक होती है।
इसी अवसर वाराणसी से साहित्यकार और आलोचक डॉ
शुभा श्रीवास्तव ने बताया कि –
बोलिया और जनपदी भाषा का सम्मान करना राहुल के स्वभाव की विशेषता थी। भोजपुरी उन्हें प्रिय थी क्योंकि वह उनकी अपनी माटी की भाषा थी। भोजपुरी में इन्होंने राहुल बाबा के नाम से नाटकों की रचना की है।
राहुल जी ने हिंदी को पढ़ा ही नहीं बल्कि जिया है। हिंदी उनकी अंतरात्मा है और बोलियां उनके लिए उसे अंतरात्मा की मधुर ध्वनियां हैं।
इस कार्यक्रम में यू एस ए जुड़ी डॉ निधि मिश्रा ने कहा बहुभाषाविद राहुल सांकृत्यायन की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू में हुई | लगभग छत्तीस भाषाओँ के ज्ञाता होने के बावजूद राष्ट्रभाषा हिंदी का उनके जीवन में विशेष स्थान था |अपने हिंदी भाषा प्रेम के कारण उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी से त्यागपत्र दे दिया | यात्रा -वृतांत के अलावा उन्होंने कहानी संग्रह, जीवनी, उपन्यास, आत्मकथा, निबंध, साहित्य आलोचना आदि भी लिखा| राहुल सांकृत्यायन का अध्ययन कार्य अनेक भाषाओँ में होने से वावजूद लेखन कार्य प्रमुख रूप से हिंदी में देखने को मिलता है |अपने प्रत्येक शोध अध्ययन के उपरांत उन्होंने हिंदीभाषियों को ज्ञान का विशाल भंडार सुलभ कराया जिससे हिंदी भाषी शायद अपरिचित रह जाते |इस प्रकार उन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी भाषा को समृद्ध किया |
वाराणसी से ही युवा वक्ता डॉ ओम प्रकाश ने कहा-
‘ इंटलेक्चुअल जायंट’ के रूप में प्रसिद्ध, बहुआयामी व्यक्तिव के धनी, इतिहास,धर्म, दर्शन, साहित्य, पुरातत्व,भाषा तत्त्व, यात्रा वृतांत, व्याकरण, तथा बौद्ध वांग्मय के जानकर,बीसवीं शताब्दी के विलक्षण प्रतिभा से संपन्न,उत्तम कोटि के यायावर, ज्ञान पिपासु ,अदम्य इच्छा शक्ति से परिपूर्ण अन्वेषक के रूप में विश्व विख्यात, उदार एवम समतामूलक भारतीय संकृति के पोषक केदार नाथ पाण्डे वैष्णव, वेदांती आदि से होते हुए साम्यवाद और मानवतावाद के रूप मे पहुंचने पर राहुल के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। उन्होंने बुद्ध की तरह ही अंध श्रद्धा के स्थान पर बुद्धिवाद, ज्ञान तथा तर्क पर विशेष जोर दिया। उनका मानना था कि शरीर को घोर कष्ट देकर व्रत, तपस्या करना एक तरह की मूर्खता है। घोर कर्मकांड तथा भक्ति की अपेक्षा उन्होंने ज्ञान और बुद्धिवाद को तरजीह दिया।
कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए डॉ सुरेन्द्र कुमार पाठक ने कहा – राहुल सांकृत्यायन एक चलते फिरते कोश थे। उन्होंने अथाह साहित्य हिन्दी को प्रदान किया है वो अविस्मरणीय है।
इस अवसर पर साहित्य जगत के अनेक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों ने कार्यक्रम में फेस बुक के माध्यम से भी भाग लिया। डा रोहित कुमार, डॉ इंदू झुनझुनवाला, डॉ सुरेन्द्र प्रताप, राजश्री, डॉ ओपी पांडेय, सुवर्णा, पुष्पांजलि जी, गिरधर जी , मैथिली जी आदि।

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