ओबरा/सोनभद्र। उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा राजस्व देने वाले सीमांत जनपद सोनभद्र में खनन माफिया और पट्टाधारकों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे सरकारी नियमों और पर्यावरणीय मानकों को ठेंगा दिखाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। ताजा और बेहद गंभीर मामला ओबरा तहसील अंतर्गत बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र का है। यहाँ संचालित मेसर्स श्री स्टोन द्वारा खनन अनुबंध की शर्तों और एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस (पर्यावरणीय स्वीकृति) की खुलेआम धज्जियां उड़ाने के सनसनीखेज आरोप सामने आए हैं। स्थानीय ग्रामीणों से मिली जानकारी और धरातल की कड़वी हकीकत को देखें तो यहाँ नियम-कानून सिर्फ सरकारी कागजों और फाइलों तक ही सीमित रह गए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब अनियमितताएं इतनी स्पष्ट और उजागर हैं, तो जिला खनन विभाग, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) और स्थानीय तहसील प्रशासन आखिर किस खास वजह से अपनी आंखें मूंदे बैठा है। बिल्ली मारकुंडी क्षेत्र में संचालित मेसर्स श्री स्टोन का यह पूरा माइनिंग कारोबार बेहद रसूखदार और बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। सरकारी अभिलेखों के अनुसार, यह खनन पट्टा आराजी संख्या 4860ग, 4862ख, 4869, 4870ख, 4873ख, 4873क, 4874ख, और 4876ख के अंतर्गत कुल 2.4401 हेक्टेयर के विस्तृत और कीमती भू-भाग पर फैला हुआ है। इतने बड़े दायरे में प्रतिदिन सैकड़ों टन पत्थरों का खनन होने के बावजूद, जब सुरक्षा, तकनीक और मानकों की बात आती है, तो यहाँ जमीनी स्तर पर स्थितियां पूरी तरह शून्य नजर आती हैं। उत्तर प्रदेश खनन नियमावली और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के मानकों के आधार पर की गई पड़ताल में पट्टाधारक द्वारा निम्नलिखित नियमों का खुला उल्लंघन पाया गया है अवैध खनन, ओवरलोडिंग और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए खनन अनुबंध की शर्त संख्या-12 के तहत पूरे परिसर को हाई-टेक 360 डिग्री सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रखना अनिवार्य है। इसके साथ ही इसका सीधा लिंक जिला प्रशासन के कंट्रोल रूम से होना चाहिए, लेकिन यहाँ ऐसा कोई इंफ्रास्ट्रक्चर दूर-दूर तक नजर नहीं आता। उत्तर प्रदेश उपखनिज (परिहार) नियमावली-2021 के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, पट्टे से बाहर निकलने वाले हर एक वाहन के सटीक नापतौल के लिए डंपर/ट्रक वे-ब्रिज (नापतौल मशीन) स्थापित होना अनिवार्य है। यहाँ धर्मकांटा न होने से इस बात की प्रबल आशंका है कि बिना सही तौल के भारी मात्रा में खनिज बाहर भेजे जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर सरकारी राजस्व को चूना लगाने का खेल है। पथरीली और भारी मशीनों वाले इस डेंजर ज़ोन में किसी भी आपातकालीन स्थिति या हादसे से निपटने के लिए माइनिंग एरिया में न तो कोई प्राथमिक उपचार केंद्र (First Aid Center) बनाया गया है, न ही एम्बुलेंस की कोई व्यवस्था है। इसके अलावा आपदा प्रबंधन का कोई भी रेस्क्यू प्लान धरातल पर क्रियान्वित नहीं है, जिससे यहाँ काम करने वाले श्रमिकों की जान हमेशा दांव पर रहती है। पर्यावरणीय स्वीकृति की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह होती है कि धूल के कणों को रोकने के लिए स्वीकृत खनन क्षेत्र के चारों तरफ सघन पौधारोपण (Green Belt) कराया जाए। मेसर्स श्री स्टोन द्वारा न तो अपनी लीज बाउंड्री पर और न ही ग्राम समाज की निर्धारित भूमि पर हरित विकास संबंधी शर्तों का पालन किया गया है। भारी ब्लास्टिंग और क्रशिंग से उठने वाले धूल के गुबार से स्थानीय पर्यावरण लगातार प्रदूषित हो रहा है और आसपास की आबादी सांस की बीमारियों की चपेट में आ रही है। इस पूरे घालमेल को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश व्याप्त है। ग्रामीणों का सीधा और साफ आरोप है कि पट्टाधारक द्वारा किए जा रहे इन तमाम उल्लंघनों की पल-पल की जानकारी क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों को भी है। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी आज तक पट्टाधारक के खिलाफ कोई भी प्रभावी, दंडात्मक या रिकवरी की कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। जब एक आम आदमी बिना परमिशन के एक ट्राली मिट्टी भी नहीं उठा सकता, तो इतने बड़े पट्टाधारक को नियमों की धज्जियां उड़ाने की खुली छूट क्यों दी गई है? बार-बार लिखित शिकायत के बाद भी अधिकारियों की यह रहस्यमयी चुप्पी और सुस्ती इस संदेह को शत-प्रतिशत गहरा करती है कि कहीं मोटे सिंडिकेट और विभागीय सांठगांठ के कारण ही तो इस पूरे अवैध खेल को अंदरूनी संरक्षण नहीं दिया जा रहा है? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां एक तरफ भू-माफियाओं के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति और पारदर्शी व डिजिटल माइनिंग (E-Mining) के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं सोनभद्र का खनन विभाग और स्थानीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कारनामे सरकार के इन दावों की हवा निकाल रहे हैं। आखिर किसके इशारे पर सरकारी खजाने, बहुमूल्य पर्यावरण और स्थानीय जनता की सेहत व सुरक्षा को ताक पर रखकर बिल्ली मारकुंडी में यह मनमानी चल रही है? संबंधित माइनिंग ऑफिसर और जिले के आला अधिकारी इस गंभीर लापरवाही पर अपनी जवाबदेही कब तय करेंगे। अब देखना यह होगा कि इस विस्तृत खोजी खबर के सार्वजनिक होने के बाद जिलाधिकारी सोनभद्र इस मामले को संज्ञान में लेकर मेसर्स श्री स्टोन के पट्टे पर उच्चस्तरीय जांच टीम भेजते हैं और पट्टा निरस्तीकरण जैसी कोई ठोस कानूनी कार्रवाई करते हैं, या फिर बिल्ली मारकुंडी के इस खनन क्षेत्र में नियमों की यह बलि और सरकारी राजस्व की यह लूट इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगी।
सोनभद्र में माइनिंग नियमों की धज्जियां बिल्ली मारकुंडी में मेसर्स श्री स्टोन पर शर्तों के उल्लंघन का गंभीर आरोप, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह अवैध खेल?
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