वाराणसी के राजकीय महिला महाविद्यालय, डी.एल.डब्ल्यू के इतिहास विभाग के तत्त्वावधान में “सोमनाथ धाम की सनातन यात्रा: आध्यात्मिकता, संस्कृति और इतिहास का संगम” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया संगोष्ठी का आयोजन हाइब्रिड मोड में हुआ जिससे देश के विभिन्न भागों से विद्वान, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता कर रहे थे महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोपेसर डॉक्टर बृज किशोर त्रिपाठी ने बताया कि सोमनाथ धाम भारतीय सभ्यता, सनातन परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ का इतिहास केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारत की संघर्षशीलता, आस्था, पुनर्निर्माण और राष्ट्रीय अस्मिता की जीवंत गाथा है। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर से प्रतिष्ठित विद्वान, इतिहासकार, शोधकर्ता, शिक्षाविद् और विद्यार्थी सम्मिलित हुए तथा सोमनाथ धाम से जुड़े ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, स्थापत्य, धार्मिक और राष्ट्रीय आयामों पर गंभीर विमर्श किया गया
प्राचार्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति की विशेषता उसकी निरंतरता, सहिष्णुता और पुनर्निर्माण की क्षमता में निहित है। सोमनाथ धाम इस चेतना का उज्ज्वल उदाहरण है। समय-समय पर अनेक आक्रमणों और विनाशों के बाद भी सोमनाथ की आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रही। स्वतंत्र भारत में सोमनाथ का पुनर्निर्माण केवल धार्मिक पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि भारतीय आत्मविश्वास और सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक भी रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह संगोष्ठी विद्यार्थियों और शोधार्थियों को भारतीय इतिहास को व्यापक, संतुलित और गहन दृष्टि से समझने की प्रेरणा देगी।
संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. कमलेश कुमार तिवारी, विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, ने आए हुए अतिथियों का स्वागत अभिनंदन किया
उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में सोमनाथ के पौराणिक महत्व, पुनर्निर्माण, स्थापत्य वैभव, तीर्थ परंपरा, सांस्कृतिक समन्वय, पर्यटन और आधुनिक प्रासंगिकता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया
डॉ. तिवारी ने कहा कि संगोष्ठी का उद्देश्य सोमनाथ धाम को केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन, कला, स्थापत्य, लोकआस्था और राष्ट्रीय चेतना के विविध आयामों को अकादमिक रूप से समझना है। उन्होंने बताया कि शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए यह आयोजन विशेष रूप से उपयोगी होगा, क्योंकि इससे उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक दृष्टि को नए संदर्भों में समझने का अवसर मिलेगा।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रमुख उप-विषयों के रूप में पौराणिक उत्पत्ति और पवित्रता, विनाश और पुनर्निर्माण के चक्र, राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक के रूप में सोमनाथ, स्थापत्य कला, तीर्थ परंपरा, सांस्कृतिक और धार्मिक समन्वय, पवित्र भूगोल, पर्यटन और आधुनिक प्रासंगिकता, आस्था और धैर्य, विरासत संरक्षण तथा आधुनिक चुनौतियाँ शामिल किए गए हैं
कार्यक्रम के सुचारु संचालन के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया था आयोजन समिति ने सभी शिक्षकों शोधार्थियों, विद्यार्थियों और विषय-विशेषज्ञों से इस संगोष्ठी में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया संगोष्ठी में प्रतिभागिता हेतु पंजीकरण शुल्क निर्धारित किया था प्राचार्य एवं आयोजन सचिव ने विश्वास व्यक्त किया कि यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन, संरक्षण और प्रसार की दिशा में एक सार्थक अकादमिक पहल सिद्ध होगी। क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी वाराणसी प्रोफेसर डॉ. ज्ञान प्रकाश वर्मा ने बताया कि यह संगोष्ठी पिछले एक माह से चल रहे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों का जो आयोजन हो रहा है ,उसी श्रृंखला में यह संगोष्ठी भी है। इससे पूर्व सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर उच्च शिक्षा विभाग जनपद वाराणसी की ओर से बीस राजकीय, अशासकीय एवं स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों में सोमनाथ ज्योर्तिलिंग व आध्यात्मिक यात्रा पर संगोष्ठी ,संवाद और वक्तव्य के कार्यक्रम आयोजित किए गए।
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