ओबरा (सोनभद्र)। औद्योगिक नगरी ओबरा की सड़कें अब सफर के लिए नहीं, बल्कि बीमारियों और हादसों को न्योता देने के लिए जानी जा रही हैं। 4 मई को ओबरा के सजग पत्रकारों ने एकजुट होकर जनमानस की समस्याओं को लेकर सोनभद्र जिलाधिकारी को एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में बग्गा नाले से लेकर शारदा मंदिर तक की सड़क पर फैले जानलेवा प्रदूषण और प्रशासनिक उदासीनता की गंभीर तस्वीर पेश की गई है। बग्गा नाले से शारदा मंदिर तक का मुख्य मार्ग आज प्रदूषण की मोटी चादर से ढका हुआ है। गिट्टी, पत्थर और डस्ट (बदरहंसी) के कारण सड़क पर प्रदूषण की ऐसी परत जम गई है कि वहां से गुजरना किसी जंग जीतने जैसा है। आलम यह है कि जब भी कोई भारी वाहन या चार पहिया गाड़ी वहां से गुजरती है, तो उड़ने वाली धूल के कारण पूरा रास्ता धुंधला हो जाता है। पीछे आने वाले मोटरसाइकिल और साइकिल सवारों को न सड़क दिखती है और न ही सामने से आता वाहन। इस मार्ग से गुजरने वाले पैदल यात्रियों और दोपहिया सवारों के कपड़े और शरीर कुछ ही मिनटों में सफेद पाउडर से पट जाते हैं। यह धूल केवल कपड़ों पर नहीं, बल्कि फेफड़ों में भी जमा हो रही है, जिससे क्षेत्र में सांस की बीमारियां घर कर रही हैं। पत्रकारों ने जिलाधिकारी को अवगत कराया कि यह क्षेत्र सरकार को भारी राजस्व देता है, लेकिन बदले में यहाँ की जनता को केवल प्रदूषण और मौत का डर मिल रहा है।अधिकारी केवल अपनी अटैची भरने में मस्त हैं, उन्हें जनता की चीखें सुनाई नहीं देतीं। न तो सड़क पर पानी का छिड़काव किया जा रहा है और न ही सड़क की सफाई। क्या आम आदमी की जान की कीमत केवल राजस्व वसूली तक ही सीमित है।सड़क पर बिखरी गिट्टी और डस्ट के कारण वाहन लगातार फिसल रहे हैं। धूल के गुबार के कारण दृश्यता कम होने से किसी भी समय बड़ी दुर्घटना घट सकती है। सड़क पर पड़े पत्थर और गिट्टी टायरों से छिटककर राहगीरों को घायल कर रहे हैं। पत्रकार संघ ने ज्ञापन के माध्यम से जिलाधिकारी से पुरजोर मांग की है कि जिलाधिकारी स्वयं इस मार्ग का औचक निरीक्षण करें ताकि धरातल की सच्चाई सामने आ सके। प्रदूषण फैला रही संबंधित कंपनियों और ठेकेदारों पर जुर्माना लगाया जाए।सड़क पर नियमित पानी का छिड़काव और मैकेनिकल स्वीपिंग मशीन से सफाई सुनिश्चित की जाए। जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।सोनभद्र का यह इलाका विकास की चमक के पीछे प्रदूषण के अंधेरे में खोया हुआ है। पत्रकारों की इस पहल ने सोए हुए प्रशासन को जगाने का काम किया है। अब देखना यह है कि जिलाधिकारी इस ज्ञापन पर क्या ठोस कार्रवाई करते हैं या ओबरा की जनता यूं ही घुट-घुट कर जीने को मजबूर रहेगी।
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