ओबरा/सोनभद्र।जनपद सोनभद्र की ओबरा तहसील अंतर्गत नगर पंचायत ओबरा इन दिनों बिजली विभाग की बदइंतजामी को लेकर गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। तपती गर्मी के इस मौसम में नगर के उपभोक्ता घोषित बिजली कटौती या रोस्टिंग से उतने परेशान नहीं हैं, जितना दिनभर में होने वाली 5 से 10 मिनट की अनगिनत अघोषित ट्रिपिंग ने उनकी नाक में दम कर रखा है। पल-पल में कट रही बिजली ने आम नागरिकों की चिंता और बिजली विभाग के प्रति आक्रोश को चरम पर पहुंचा दिया है। नगर के गजराजनगर सहित कई रिहायशी और व्यापारिक इलाकों में स्थिति अब बेहद नारकीय होती जा रही है। कुछ देर बिजली आती है, फिर अचानक सप्लाई बाधित हो जाती है। थोड़ी देर बाद सप्लाई बहाल होती है, तो कुछ ही मिनटों में दोबारा चली जाती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल बत्ती गुल होने का सामान्य मामला नहीं है। बार-बार की इस ट्रिपिंग, वोल्टेज के भारी उतार-चढ़ाव (फ्लक्चुएशन) और हॉफ फेस जैसी तकनीकी खामियों के कारण घरों में लगे महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण दम तोड़ रहे हैं।ओबरा जैसे श्रमजीवी और मध्यमवर्गीय बाहुल्य क्षेत्र में टीवी, फ्रिज, कूलर, एसी और इनवर्टर जैसे उपकरण कोई विलासिता नहीं, बल्कि इस मौसम की बुनियादी जरूरत हैं। लोग इन्हें अपनी गाढ़ी कमाई, खून-पसीने की बचत और कई बार बैंकों की किस्तों (EMI) पर खरीदते हैं। ऐसे में जब बार-बार की अघोषित ट्रिपिंग से किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार का टीवी या फ्रिज फुंक जाता है, तो उसका आर्थिक दर्द असहनीय होता है। अब उपभोक्ताओं के बीच यह तीखा सवाल खुलकर उठने लगा है।जब विभाग को हर महीने समय पर पूरा बिल चाहिए, तो उनकी लापरवाही से खराब हो रहे उपकरणों की आर्थिक जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा। ओबरा में बिजली की यह आंख-मिचौली उत्तर प्रदेश सरकार के दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक तरफ सूबे के ऊर्जा मंत्री ए. के. शर्मा लगातार ट्रिपिंग रोकने, निर्बाध बिजली आपूर्ति करने और उपभोक्ताओं के साथ संवेदनशील व्यवहार बनाए रखने के कड़े निर्देश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ओबरा का स्थानीय अमला इन निर्देशों को ठेंगे पर रख रहा है। इस प्रशासनिक लापरवाही की पुष्टि यू.पी.एस.एल.डी.सी. (प्रणाली नियंत्रण) का आधिकारिक रोस्टर खुद करता है। ओबरा जैसी नगर पंचायतों और तहसीलों के लिए 24 घंटे में मात्र 02:30 घंटे (ढाई घंटे) की ही विद्युत कटौती निर्धारित है। कागजों पर लिखित आदेश ढाई घंटे का है, लेकिन धरातल पर पल-पल होने वाली अघोषित ट्रिपिंग के कारण आपूर्ति घंटों बाधित रहती है। यह सीधे तौर पर स्थानीय प्रबंधन की विफलता या तकनीकी घोर लापरवाही को उजागर करता है। स्थानीय उपभोक्ताओं का आरोप है कि समस्या केवल तकनीकी खराबी तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय बिजली दफ्तर की कार्यप्रणाली भी पूरी तरह चरमरा चुकी है। जब लोग अपनी वास्तविक परेशानी लेकर स्थानीय उपकेंद्र या जिम्मेदारों से संपर्क करते हैं, तो उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती। विभागीय कर्मचारियों का व्यवहार भी उपभोक्ताओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहता। यही कारण है कि अब थक-हारकर लोग सोशल मीडिया (X/ट्विटर, फेसबुक) और स्थानीय समाचार माध्यमों के जरिए अपनी आवाज बुलंद करने को मजबूर हैं। उपभोक्ता संरक्षण के मूल सिद्धांत साफ कहते हैं कि यदि कोई नागरिक किसी सेवा के लिए निर्धारित शुल्क (बिजली बिल) का भुगतान कर रहा है, तो उसे सुरक्षित, संतुलित और गुणवत्तापूर्ण सेवा मिलना उसका कानूनी अधिकार है। ओबरा नगर की यह स्थिति अब केवल बिजली आने-जाने का सामान्य विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। अब स्थानीय जनता ने मांग की है कि।संबंधित उच्चाधिकारी और पश्चिमांचल/पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के शीर्ष अधिकारी स्वयं ओबरा नगर की वास्तविक स्थिति का संज्ञान लें। स्थानीय ग्रिड, जर्जर तारों और वितरण प्रणाली की निष्पक्ष तकनीकी समीक्षा कराई जाए। लापरवाह स्थानीय अभियंताओं की जवाबदेही तय हो और जनता को कागजी दावों के बजाय धरातल पर स्थिर, सुरक्षित और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था दी जाए।
ओबरा में अघोषित बिजली ट्रिपिंग से जनता त्रस्त कागजों पर ढाई घंटे की कटौती, धरातल पर हर 10 मिनट में गुल हो रही बत्ती उपकरणों के फुंकने से उपभोक्ता परेशान
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