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Home » सोनभद्र का बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र बना डेथ ज़ोन, कागजों पर ऑल इज वेल दिखाकर नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां
सोनभद्र

सोनभद्र का बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र बना डेथ ज़ोन, कागजों पर ऑल इज वेल दिखाकर नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां

adminBy adminThursday, 4 June 2026, 19:45 ISTNo Comments5 Mins Read
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सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) 04 जून, 2026 उत्तर प्रदेश का सबसे प्रमुख खनिज हब ‘सोनभद्र’ एक बार फिर सुलग रहा है। बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे अवैध और अनियंत्रित खनन ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। 15 नवंबर, 2025 को हुए उस दर्दनाक हादसे की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं जिसने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। लेकिन दावों और वादों के विपरीत, जमीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है।
स्थानीय ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि क्षेत्र में मानकों के विपरीत भारी ब्लास्टिंग, दिन-रात अवैध भूजल दोहन और स्वीकृत माइनिंग प्लान का खुला उल्लंघन हो रहा है। इसके खिलाफ जब जनता मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) पर गुहार लगाती है, तो जमीनी स्तर पर जांच करने के बजाय खान निरीक्षक अतुल दुबे द्वारा बंद कमरों में बैठकर ही रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है। बिना किसी भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के शिकायतों को बलपूर्वक निस्तारित दिखा दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह लापरवाही किसी बड़े नरसंहार को आमंत्रण देने जैसी है, क्योंकि पूरी माइनिंग बेल्ट इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है। पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत कार्यकर्ता निर्भय चौधरी ने इस पूरे मामले में सीधे तौर पर खनन विभाग और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइंस सेफ्टी (DGMS) की सांठगांठ को उजागर किया है। उन्होंने साक्ष्यों के साथ जिले की कई बड़ी ई-टेंडर खदानों को इस सिंडिकेट का हिस्सा बताया है, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं।साई राम इंटरप्राइजेज ,
बालाजी माइंस ,शिव स्टोन, श्री स्टोन,मंगला प्रसाद खदान, निर्भय चौधरी ने कड़े शब्दों में कहा इन खदानों के खिलाफ सारे सबूत अधिकारियों के टेबल पर पड़े हैं, लेकिन निष्पक्ष जांच करने के बजाय फाइलों को दबा दिया जाता है। जब इस विषय पर हमने मुख्य खनन अधिकारी से उनका आधिकारिक पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने कैमरे पर भागते हुए गैर-जिम्मेदाराना लहजे में कहा—हमें लिखित में शिकायत दीजिये, तब जाकर इस विषय में हम सोचेंगे। यह रवैया साफ करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
खोजी पड़ताल में सामने आया है कि इन खदानों के पास जल प्रबंधन और पर्यावरण विभाग की अनिवार्य अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) तक मौजूद नहीं है। इसके बावजूद एक ओर सरकार जल जीवन मिशन के तहत हर घर पानी पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं दूसरी तरफ खनन लॉबी प्रतिदिन लाखों लीटर भूजल को अवैध रूप से बर्बाद कर रही है। खदानों से उड़ने वाले डस्ट (धूल के गुबार) के कारण बिल्ली-मारकुंडी के आसपास के गांवों में रहने वाले बच्चे और बुजुर्ग सिलिकोसिस और अस्थमा जैसी फेफड़ों की गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। हैवी एक्सप्लोसिव्स (भारी विस्फोटकों) के इस्तेमाल से आसपास की जैव विविधता और वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास पूरी तरह नष्ट हो चुका है। नियमों को ठेंगा दिखाकर प्रतिदिन हजारों ओवरलोडेड टिप्परों के माध्यम से बोल्डर और गिट्टी का अवैध परिवहन बदस्तूर जारी है। सुरक्षा मानकों के लिहाज से डीजीएमएस का नियम कहता है कि किसी भी पत्थर या बोल्डर खदान की माइनिंग हमेशा सीढ़ीनुमा संरचना यानी ब्रेंच (Bench System) बनाकर की जानी चाहिए, ताकि ढलान स्थिर रहे और पत्थर खिसकने पर श्रमिकों की जान बचाई जा सके। परंतु बिल्ली-मारकुंडी में मुनाफाखोरी के चक्कर में खदान संचालक 90 डिग्री की सीधी वर्टिकल (खड़ी) खुदाई कर रहे हैं। खदानें अपनी तय सीमा से कहीं अधिक गहरी और खतरनाक हो चुकी हैं। सीमित क्षेत्रफल में इतनी गहरी खुदाई नियमों के अनुसार पूरी तरह प्रतिबंधित है, फिर भी डीजीएमएस के जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। भ्रष्ट तंत्र पर प्रहार करते हुए निर्भय चौधरी ने स्पष्ट किया कि उनकी यह लड़ाई सूबे के मुख्यमंत्री से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर बैठे उन ब्यूरोक्रेट्स (अधिकारियों) से है जो मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस विजन को पलीता लगा रहे हैं। अधिकारी कागजों पर ऑल इज वेल दिखाकर लखनऊ बैठे उच्चाधिकारियों को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने जिला प्रशासन को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह इस पूरे मामले को लेकर नव-नियुक्त जिलाधिकारी से मिलेंगे। यदि विस्फोटकों के अवैध उपयोग, रात्रिकालीन परिवहन और पर्यावरण मानकों की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो वे जनहित में माननीय उच्च न्यायालय में एक वृहद जनहित याचिका (PIL) दायर करेंगे। सामाजिक संगठनों ने खनन विभाग और डीजीएमएस को कटघरे में खड़ा करते हुए 5 मुख्य सवाल सार्वजनिक रूप से पूछे हैं, जिनका जवाब आज सोनभद्र का हर नागरिक चाहता है।खदानों की सुरक्षा को लेकर निर्धारित गाइडलाइंस क्या हैं और उन्हें सार्वजनिक पोर्टल पर क्यों नहीं रखा गया? खनन विभाग और डीजीएमएस द्वारा खदानों के औचक और नियमित निरीक्षण की समय-सीमा क्या तय है, और पिछले 6 महीनों में कितने निरीक्षण किए गए?अवैध खनन के दोषी पाए जाने पर इन रसूखदार संचालकों से अब तक कितना आर्थिक दंड वसूला गया और उन पर क्या दंडात्मक कार्रवाई हुई? ऑनलाइन ट्रांसपोर्ट परमिट (रवाना) जारी करने की क्या व्यवस्था है और प्रतिबंधित होने के बावजूद रात्रिकालीन अवैध परिवहन किसकी शह पर हो रहा है? इन खतरनाक खदानों में काम करने वाले दिहाड़ी और गरीब मजदूरों के स्वास्थ्य, मेडिकल और लाइफ इंश्योरेंस (बीमा) की क्या पुख्ता व्यवस्था है? इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि यदि समय रहते सोनभद्र के इस खनन बेल्ट में सख्त प्रशासनिक कदम नहीं उठाए गए, तो 15 नवंबर 2025 जैसी भीषण त्रासदी को दोबारा दोहराने से कोई नहीं रोक पाएगा। अब देखना यह है कि नवागत जिलाधिकारी इस खनन सिंडिकेट पर क्या हंटर चलाते हैं।

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